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मर्यादा, रिश्तों और समरसता की मिसाल हैं श्रीराम, उत्तम पुरुष जो सिखाते हैं जीवन जीने का तरीका

श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या में 16 जनवरी 2024 से प्राण-प्रतिष्ठा का पूजा अनुष्ठान शुरू हो चुका है और 22 जनवरी को राम भक्तों के लिए ऐतिहासिक और भावुक कर देने वाला दिन है. इस वक्त देश श्रीराम के जयघोष से गूंज रहा है. मगर राम महज लोगों की भावनाओं में समाए हुए देव नहीं हैं कि […]

मर्यादा, रिश्तों और समरसता की मिसाल हैं श्रीराम, उत्तम पुरुष जो सिखाते हैं जीवन जीने का तरीका

श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या में 16 जनवरी 2024 से प्राण-प्रतिष्ठा का पूजा अनुष्ठान शुरू हो चुका है और 22 जनवरी को राम भक्तों के लिए ऐतिहासिक और भावुक कर देने वाला दिन है. इस वक्त देश श्रीराम के जयघोष से गूंज रहा है. मगर राम महज लोगों की भावनाओं में समाए हुए देव नहीं हैं कि जिनके प्रति सिर्फ आस्था रखी जाए अपितु श्रीराम सही मायने में उत्तम पुरुष हैं, जो जीवन जीने का तरीका सिखाते हैं, फिर चाहे वह रिश्ते निभाना हो या फिर वचन, इसलिए तो ये कहावत आज भी कही जाती है कि “रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाय पर वचन न जाय”, यहां तक कि कौशल्या नंदन ने अपने शत्रु का भी मान रखा और स्वयं रावण के ज्ञानी मानने में कोई गुरेज नहीं किया.

आज भी अक्सर कहते सुना जाता है कि राम राज्य की स्थापना होगी. इसका मतलब किसी धर्म, जाति या फिर विशेष समुदाय के राज से नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है सबको एक सूत्र में पिरोना एक ऐसे राज्य का स्थापना करना जहां हर ओर प्रेम, शांति, सुख और भाईचारा कायम हो. भगवान राम को पालनकर्ता श्रीहरि विष्णु का सातवां अवतार माना गया है और उनका ये जन्म अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना करना था. श्रीराम को भगवान के रूप में पूजा जाता है, लेकिन अगर उनके आदर्शों को जीवन में उतार लिया जाए तो सही मायने जीवन जीने का तरीका सीखा जा सकता है. क्योंकि श्रीराम जहां रिश्तों के समन्वयक थे तो वहीं वचन निभाने से लेकर शत्रु का सामना करने और जात-पात से ऊपर उठना सिखाने वाले उत्तम पुरुष हैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम.

भगवान श्रीराम में हैं उत्तम पुरुष होने के 16 गुण

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में प्रभु श्रीराम में 16 गुण बताए गए हैं जो नेतृत्व करने के सबसे अहम सूत्र हैं और इस लोक में उन्हें आदर्श पुरुष बनाते हैं. जब महर्षि वाल्मीकि नारद जी से प्रश्न करते हैं कि इस संसार में ऐसा कौन धर्मात्मा और कौशल पराक्रमी है, धर्म का ज्ञाता, कृतज्ञ, सत्यवादी और व्रत का पक्का है और कौन चरित्र से संपन्न है और कौन सभी प्राणियों के लिए हितकारी है, वह कौन है जो विद्वान है और विलक्षण रूप से सुखदायक व संयमी है. वह कौन है जिसने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली है और तेजस्वी है व जिसमें ईर्ष्या नहीं है. युद्ध में क्रोधित होने पर देवता किससे डरते हैं. तब उनके इस प्रश्न का उत्तर देते हुए नारद जी कहते हैं कि हे महर्षि इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए श्रीराम में ये सभी गुण विद्यमान हैं.

ये हैं सोलह गुण

गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्य वाक्य, दृढ़व्रत, चरित्रवान, सर्वभूतहितः, विद्वान, समर्थ, सदैक प्रियदर्शन, आत्मवान, जितक्रोध, द्युतिमान्, अनसूयक, बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे. प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन काल में इन सभी गुणों से ही समरसता का संचार किया था.

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समरसता का पाठ पढ़ाते हैं श्रीराम

माता शबरी की पौराणिक कथा मिलती है, जिसमें भक्त का भगवान के प्रति और भगवान का भक्त के प्रति प्रेम और भक्ति भाव दर्शाया गया है. जिसमें बताया गया है कि माता शबरी अपने प्रभु राम के लिए प्रेम से बेर तोड़कर लाती हैं और उन्हें चखकर रामजी को खिलाती हैं ताकि उनके मुख में गलती से खट्टा बेर न चला जाए. राम जी भी अपनी भक्त के प्रेम में खुशी से बेर ग्रहण करते हैं.

इस कहानी की मूल उद्देश्य देखा जाए तो जात-पात के भेदभाव को मिटाना है. इसी तरह रामायण के अयोध्या कांड में केवट की कथा भी मिलती है जब निषादराज केवट अपनी नाव में भगवान राम और माता सीता को गंगा पार करवाते हैं.

रिश्तों के समन्वयक हैं प्रभु श्रीराम, सिखाते हैं वचन निभाना

भगवान राम सिखाते हैं कि स्थिति चाहे जो भी हो रिश्तों को निभाने में कभी पीछे नहीं हटना चाहिए. जब कैकयी राम जी के लिए 14 वर्षों का वनवास मांगती हैं तो राजा दशरथ अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को वन जाने की आज्ञा देते हैं. अपनी पिता की आज्ञा का पालन करते हुए राम सहर्ष वन जाना भी स्वीकार कर लेते हैं. इस दौरान छोटे भाई लक्ष्मण और माता सीता भी साथ जाते हैं.

जब शत्रुघ्न अपने बड़े भाई को वापस अयोध्या ले जाने के लिए जाते हैं तो भगवान राम उनके साथ जाने से इंकार कर देते हैं और पिता को दिया हुआ वचन पूर्ण करने के लिए वन ही निवास करते हैं. इस तरह राम जी रिश्तों का मान रखते हुए वचन व्रत को पूर्ण करने की भी सीख देते हैं.

प्रभु राम खराब स्थिति में भी हिम्मत न हारने की देते हैं प्रेरणा

अरण्यक वन में जब छल से रावण माता सीता का हरण कर लेता है तो प्रभु राम अपनी अर्धांगिनी सीते की विरह में वह व्याकुल हो जाते हैं, लेकिन उस स्थिति में भी वह हिम्मत नहीं हारते हैं और नल-नील, बजरंगबली, सुग्रीव की वानर सेना के साथ मिलकर युद्ध का शंखनाद करते हैं और रावण का वध कर राम राज्य की स्थापना करते हैं. इस तरह से भगवान राम हर स्थिति में हिम्मत न हारने और एकता में शक्ति की भावना को समझाते हैं.

शत्रु का भी रखा मान

आज के वक्त में रिश्तों की न तो कोई मर्यादा रही है और न ही उनमें मान रखने की भावना रही है और अपना ही अपनों का शत्रु बन बैठा है, लेकिन श्रीराम जी ने अपने जीवन में सिखाया कि कैसे न सिर्फ रिश्तों बल्कि शत्रु तक का मान रखना चाहिए. पौराणिक कथाओं में एक प्रसंग मिलता है कि जब रावण मृत्यु शैय्या पर था तब राम जी अपने अनुज लक्ष्मण से कहते हैं कि वह जाएं और रावण से कुछ ज्ञान लें. तब रावण ने तीन सीख दी थीं कि शुभ कार्यों में विलंब नहीं करना चाहिए, अशुभ कार्यों को टालने के प्रयास करने चाहिए और अहम में इतने अंधे नहीं होना चाहिए कि शत्रु को आप कम आंकने लगे. इस तरह से प्रभु राम ने शत्रु का मान रखना भी सिखाया.